बौद्ध धर्म का पुनर्जागरण वैचारिक क्रांति -पद्मश्री प्रो. सुखदेव थोरात वर्धा :- आधुनिक भारत में बौद्ध धर्म का पुनर्जारण 1956 से हुआ है। भारत के साथ-साथ विदेशों में बौद्ध धर्म का विस्‍तार हो रहा है। बौद्ध धर्म का पुनर्जारण एक वैचारिक एवं मानसिक क्रांति के तौर पर देखा जा रहा है। पुनर्जागरण के लिए इसकी सीमाओं और अवरोधों को जानना आवश्‍यक है। उक्‍त विचार विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व अध्‍यक्ष पद्मश्री डॉ. सुखदेव थोरात ने व्‍यक्‍त किये। वे महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में पालि सोसायटी ऑफ इंडिया और विश्‍वविद्यालय के डॉ. भदंत आनंद कौसल्‍यायन बौद्ध अध्‍ययन केंद्र के संयुक्‍त तत्‍वावधान में पालि दिवस के उपलक्ष्‍य में आयोजित अंतरराष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी के उदघाटन समारोह में बतौर मुख्‍य अतिथि बोल रहे थे। 31 मार्च और 01 अप्रैल 2019 को में महात्‍मा गांधी अंतराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में इस संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया। संगोष्‍ठी का उदघाटन कार्यकारी कुलपति प्रो. मनोज कुमार की अध्‍यक्षता में रविवार, 31 मार्च को गालिब सभागार में किया गया। समारोह में मंच पर कार्यकारी कुलसचिव प्रो. के. के. सिंह, पालि सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्‍यक्ष डॉ. भिक्षु स्‍वरूपानंद महाथेरो, कोलकाता के संघनायक डॉ. सत्‍यपाल, भदंत सदानंद महाथेरो, प्रो. अंगराज चौधरी, प्रो. बालचंद खांडेकर, डॉ. एम. एल. कासारे, प्रो. भागचंद जैन, प्रो. रमेश चंद्र नेगी, रमेश प्रसाद, भिक्षु नंदरत्‍न, भिक्षु धम्‍मप्रिय उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. भदंत आनंद कौसल्‍यायन बौद्ध अध्‍ययन केंद्र के प्रभारी तथा स्‍थानीय संयोजक डॉ. सुरजीत कुमार सिंह ने किया। स्‍वागत वक्‍तव्‍य कार्यकारी कुलसचिव प्रो. के. के. सिंह ने दिया। प्रो. थोरात ने कहा कि बौद्ध धर्म के पुनर्जागरण संदर्भ में इसके उदय, पतन और बदलाव इन तीन तथ्‍यों को जानना चाहिए। धर्म के महत्‍व को समझाते हुए उन्‍होंने कहा धर्म व्‍यक्तिगत और सामाजिक जीवन में म‍हति भूमिका रखता है, साथ ही वह नैतिक मूल्‍य भी प्रदान करता है। इन मूल्‍यों को बताते हुए उन्‍होंने कहा कि छटवीं शति इसा पूर्व में समाज में कुछ सामाजिक सिद्धांत प्रचलन में थे जिनमें वैदिक, परंपरागत श्रामणिक जन सिद्धांत प्रमुख थे। अपने सारगर्भित वक्‍तव्‍य में उन्‍होंने बौद्ध धर्म के मूल्‍य, विकास और आवश्‍यकता को प्रतिपादित करते हुए अनेक संदर्भों के साथ अपने विचार प्रकट किये। अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में कार्यकारी कुलपति प्रो. मनोज कुमार ने अतिथि वक्‍ताओं के संदर्भों को समेटते हुए कहा कि इतिहास खत्‍म नहीं होता, वह वर्तमान को छूता है। उन्‍होंने महात्‍मा गांधी और आचार्य विनोबा भावे के मानव और धर्म के संबंध विचार का हवाला देते हुए कहा कि मनुष्‍य को अवतार बनाना विभेदकारक और घातक है। उन्‍होंने धर्म के बारे में बताया कि आज भ्रामक धार्मिक साहित्‍य की भरमार है, ऐसे साहित्‍य के ऐतिहासिक अनुसंधान की आवश्‍यकता है। संगोष्‍ठी की सार्थकता के लिए उन्‍होंने अकादमिक शोध पर बल दिया। इस अवसर पर मंचासीन वक्‍ताओं ने अपने विचार रखे। उदघाटन समारोह में डॉ. ज्ञानादित्‍य शाक्‍य, नंदरत्‍न स्‍थविर, नागपुर की डॉ. रेखा बडोले की मराठी पुस्‍तक ‘पालि व्‍याकरण’, अजय मौर्या की पुस्‍तक ‘डॉ. भीमराव अंबेडकर का सामाजिक संघर्ष’ इन पुस्‍तकों का विमोचन किया गया। दीप प्रज्‍ज्‍वलन और पंचशील वंदना से कार्यक्रम का प्रारंभ किया गया। मंचासीन अतिथियों का स्‍वागत बैज लगाकर किया गया। इस अवसर पर देशभर के विश्‍वविद्यालय एवं महाविद्यालयों से आए प्रतिभागी, विश्‍वविद्यालय अध्‍यापक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्‍या में उपस्थित थे। दिनभर विभिन्‍न समानांतर शिक्षा सत्रों में विद्वान, वक्‍ताओं और शोधार्थियों ने बौद्ध धर्म के पुनर्जागरण के विषयों में शोध पत्र प्रस्‍तुत किये। कार्यक्रम में पालि सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्‍यक्ष डॉ. भिक्षु स्‍वरूपानंद महाथेरों ने विश्‍वविद्यालय के डॉ. भदंत आनंद कौसल्‍यायन बौद्ध अध्‍ययन केंद्र के प्रभारी डॉ. सुरजीत कुमार सिंह को महाराष्‍ट्र पालि सोसायटी का अध्‍यक्ष घोषित किया। संगोष्‍ठी का समापन कुलपति प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र की अध्‍यक्षता में सोमवार 1 अप्रैल को दोपहर 2 बजे से गालिब सभागार में होगा।